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Sunday, March 3, 2013

धूप-घड़ी


पलंग पर पड़े-पड़े
मैं देखती रही
कमरे की छत पर
चिपके
चौरस धूप के टुकड़े को
इंतज़ार करती
उसका आकार बदलने का
वो बदला
और सहसा मुझे
याद आया

जीवन का आकार बदलना
भाग्य की
धूप-घड़ी के
संग-संग !


खुशियों का सॉफ्टवेयर


ज़िदगी की वैबसाइट से जब भी
खुशियों का सॉफ्टवेयर
डाउनलोड करने की
कोशिश करती हूँ,
सर्वर जाने क्यूँ
स्लो हो जाता है !!
कई बार कोशिश
करके देखा ...
कभी पूरा लोड
नहीं हो पाता है,
सौ प्रतिशत होने से पहले ही
'इंस्टॉल न हो पाने ' का मैसेज
आ जाता है !!
तब जाकर ये ख्याल आता है,
कि सभी लोग लगे होंगे
इसे डाउनलोड करने में,
इसीलिए ये बिज़ी जाता है
और मेरी तो क्या,
किसी की भी ज़िदगी में
कभी पूरा इंस्टॉल
नहीं हो पाता है !
'करप्ट' साइट से करो,
तो निश्चित ही वायरस
आ जाता है,
सीधे तरीके से
खुशियाँ लोड करना
बड़ा इंतज़ार कराता है,
फिर भी नहीं हो पाता है .........!!

Friday, September 14, 2012

हिंदी


   

  हिंदी हमारा गौरव है , हिंदी हमारी शान है
  हिंदी हमारी परिचायक, हिंदी ही पहचान है !
  यही हमारी मात्रभाषा , यही हमारी राष्ट्रभाषा
  इसका और प्रचार करें हम, यही हमारी अभिलाषा
  हिंदी की आधारशिला पे खड़ा ये हिदुस्तान है
  हिंदी हमारा गौरव है , हिंदी हमारी शान है !!
            लेखकों की रचनाएँ, महाकवियों की कविताएँ
           हिंदी में अनुवादित होकर ज्ञान का अमृत बरसाएँ
           हिंदी के कारण ही बने सब वेद और ग्रन्थ महान हैं
            हिंदी हमारा गौरव है , हिंदी हमारी शान है!!
  देश के कोने-कोने को एक सूत्र में जो जोड़े
  उस हिंदी की महिमा में स्तुति शब्द भी हैं थोड़े
  मानव की देन न मानो, यह शारदा का वरदान है
  हिंदी हमारा गौरव है , हिंदी हमारी शान है !! 
           मानस-मन आलोकित करती, ज्ञान का भंडार है
           सरस्वती के उपासकों को विद्या का उपहार है
          विद्या के इस ज्ञान पुंज पर हम सबको अभिमान है
          हिंदी हमारा गौरव है , हिंदी हमारी शान है !!
           sep. 1992

Friday, August 10, 2012

कृष्ण


     

         " कान्हा "

      नटखट कान्हा मनभावन 
      मोहक छवि, चंचल नयन
      गोकुल बलिहारी जिस पर 
      ऐसी है उसकी चितवन  !!

      गोपियों का वह चितचोर 
      राधा का अटका उसमें मन 
      वो है तो हर्षित नर-नारी 
      उसके बिन सूना मधुबन !!

      माखन चोरी का भोलापन 
      श्रीदामा से ह्रदय मिलन 
      उसी कृष्ण की गाथा हैं 
      जिसने दिया गीता प्रवचन !!

      कंस, पूतना तार दिए सब 
      दुष्टों का कर दिया दलन
      हे कृष्ण फिर आ जाओ तुम 
      धरती को कर दो पावन !!

      हे मधुसूदन , भूल गये क्या 
      तुमने जो था दिया वचन ?
      "जब -जब पाप का बोझ बढ़ेगा,
      आऊँगा करने दमन !"

      धरती करती है आह्वाहन 
      आ भी जाओ देवकी नंदन 
      फिर लाज बचाओ भारत की 
      फिर छोड़ो अपना सुदर्शन !!! 
      
      
     
      

      
       
       
     
      
      
      

Sunday, June 17, 2012

आंसू



    Blue Eye Tears
      'आँसू '
   क्यों कोरों से ही डरकर 
   वापिस लौट जाते हैं 
   क्यों खुलकर नयनों से 
   बाहर नहीं आ पाते  हैं !!
   इतने मूक  होकर के भी 
   सारी व्यथा सुनते हैं
   कितने जख्मों को न जाने 
   कबसे खुद में समेटे हैं 
   एक सिरा खुलते ही जैसे 
   सारे बिखरे जाते हैं 
   बंधन में मैं रखना चाहूँ
   ये खुलकर बहना चाहें 
   पर जब इनको मुक्ति दूँ 
   उस पल न बहना चाहें 
   शायद कोई भय है इनको 
   या प्रीत है मेरे नेहों से 
   बिन बरसे ही सघन हो रहे
   नीर भरे कुछ मेहों से !
   जो भी हो, मुझको लेकिन 
  अपना फर्ज़ निभाना है 
   इनको प्रेम-प्यार से अपने 
   दिल में पालते जाना है
   नादाँ , चंचल समझ न पाते 
   किस से कितना बतियाना है 
   जब तक ये परिपक्व न होंगे 
   तब तक यहीं बसाना है !!
   
  

Monday, May 14, 2012

दर्द

                   Love is Pain Wallpapers

                   दर्द जब हद से गुज़र जाये
     तो क्या कीजे  !!   
     दवा भी कोई काम न आए 
     तो क्या कीजे !!
     दर्द में निकला किया  करती हैं आहें 
     आहें भी सिसक के  थक जाएँ 
     तो क्या कीजे !!


    सुनते थे दुआओं का असर 
    हम दवा के बाद 
    दुआएं भी अनसुना कर जाएँ 
    तो क्या कीजे !!


    हर दर्द होगा आखरी
    ये सोच कर सहा 
    आखरी की हद नज़र न आए 
    तो क्या कीजे !!


    लगता है ज़हर ही है 
    मेरे ग़म की अब दवा 
    वो भी न पी पाए मुझे 
    तो क्या कीजे !!


    थक चुके हैं इतना 
    कि रोने का दम नहीं 
    पर ढीठ  आंसू तब भी आयें  
    तो क्या कीजे !!

    बेखबर बैठे  हैं  
    हरकतों से वो अपनी 
    जान के आईना छुपायें  
    तो क्या कीजे !!      


Saturday, May 12, 2012

माँ


    निर्झर प्रेम-प्रपात बहाती 
    ममता-मेघ घने बरसाती 
    जीवन कंटक चुभ न पायें 
    यह सोच के उर में हमें  छिपाती
    फिर भी जीवन संध्या में 
    जाने  क्यों एकाकी रह जाती !!

    उसकी दृष्टि ताड़ ही लेती 
    मुस्कान के पीछे की व्यथा 
    हंसी की ओट में छिपे हुए 
    मूक अश्रुओं की कथा 
    किन्तु अपने स्वयं के अश्रु 
    हम सबसे क्या खूब छिपाती 
    अपनी जीवन संध्या में 
    जाने क्यों एकाकी रह जाती !!

   सींचा करती जिन फूलों को 
   अपने रक्त के पोषण से 
   वही फूल कंटक बन जाते 
   न लजाते उसके शोषण से 
   फिर भी क्षमाशील ह्रदय से 
   आह कभी न निकल पाती
   अपनी जीवन संध्या में 
   जाने क्यों एकाकी रह जाती !! 

   माँ तेरा उपकार असीमित
   कुछ भी करके चुका न पाऊं !
   बोल है क्या अनमोल जगत में 
   तुझसा, तुझको जो दे पाऊं  ??
   अपना यौवन तुझको दे दूँ 
   जर्जर तन-मन के बदले 
   ऐसा कुछ कानून बनाऊं 
   फिर कभी न कोई तुझे छले !
   
    तू मुझमें , मैं  तुझमें 
    क्यों नहीं परस्पर ढल जाती !
    फिर देखूं जीवन संध्या में 
    कैसे  तू एकाकी रह जाती !!!
  
   

Saturday, April 28, 2012

धूप


    गर्मी में अल्हड़ बच्चे सी
    इठलाती, इतराती धूप
    सबको खूब सताती धूप
    हाथ जोड़ मनुहार करती
    फिर भी न भरमाती धूप !!

        सर्दी में तरुणा जाती
        देखो तो शर्माती धूप
        एक झलक देने को अपनी
        कितना तरसा जाती धूप !!

  गर्मी का वह अल्हड़पन
  जाने कहाँ धर आती धूप
  जिस से बचे फिरा करते थे,
  वो ही याद आ जाती धूप !!


 

       जब आता सावन का मौसम ,
       दुल्हन सी बन जाती धूप
       बादल के घूंघट की ओट में
       मुखड़ा अपना छुपाती धूप !!

  जब बादल बरखा बनता
  घूंघट उसका हटा जाता
  इन्द्रधनुषी दुल्हन बनके
  आभा तब बिखराती धूप !!

       आदित का वरदान हमें है
       धरती की चादर यह धूप
       धूप एक ही, हर मौसम में
       फिर भी बदले कितने रूप !!

  कभी अनमना कर जाती
  तो कभी सुकूँ दे जाती धूप
  फिर भी हमको हर हाल में
  भाती ही भाती यह धूप !!


यादों के जाले

      
 


 

   यादों के जाले 
   जितने झाडूं, बनते ही जाते हैं ........
   एक झाड़ के हटूं,
   तो तैयार दूजा मिलता है !

   कितनी तीव्र है 
   वक्त की मकड़ी 
   चैन से बैठने नहीं देती 
   जरा घड़ी !

  थक गयी हूँ 
  साफ़ करते-करते ये 
  स्मृतियों के जाले !
  इन्हें देखकर खुद को इनमें 
  फंसा हुआ पाती हूँ 
  मकड़ी के शिकार जैसा ! 
  मकड़ी रुपी वक्त के 
  शिकार जैसा ! 

  बेबस उसमें फंसी  
  छटपटाती हूँ 
  निकल नही पाती हूँ 
  कसमसाकर रह जाती हूँ !

  वर्तमान में नहीं  आ पाती हूँ 
  और वहीं दम तोड़ देती हूँ !!




  

Saturday, April 21, 2012

आखिर बरखा क्यूँ आती है ?



            जब भी यह बरखा आती है 
            लगभग सब कुछ धो जाती है 
            लेकिन मैं तो धुल नहीं पाती
            बल्कि कहीं खो जाती हूँ .........

            बरखा देती औरों को 
           मधुमासी मीठापन 
           शीतलता और मुस्कान 
           लेकिन मैं तो रो जाती हूँ 
            दूर कहीं पे खो जाती हूँ ..........


         
  

              धुंधली यादों के दर्पण को 
              धोकर साफ़ ये कर जाती है 
              सब प्रतिबिम्ब कहीं खोए जो,
              उसमे जीवित हो उठते हैं 
              वही दृश्य और वही सम्वाद ,
              वही स्फूर्ति, वही अवसाद  
              फिर से मन में भर जाते हैं ..........
   
             फिर से भीग जाता है तन-मन 
             फिर से भीग जाते हैं नयन 
             सब कुछ भीगा हो जाता है 
             देह की माटी से लेकर के 
             उर की गहरी घाटी  तक ............

            वहीँ भटक कर रह जाती हूँ 
            वापिस नहीं मैं आ पाती हूँ !
            वापिस नही मैं आ पाती हूँ ...............
    
            आखिर क्यूँ आती है बरखा 
            तहस-नहस कर जाती मुझको 
            जीवन के चंचल सागर में 
            हलचल और मचा जाती है 
           आखिर बरखा क्यूँ आती है..........
           आखिर बरखा क्यूँ आती है ?