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Wednesday, June 19, 2013

उत्तराखंड विपदा


तारणहार ही डूब रहे 
कैसी प्रलय है आयी  !
देखके तांडव प्रकृति का 
मौत भी है थर्रायी !

चहुँदिस हाहाकार मचा है 
चीखें हैं और रूदन 
पर्वत,पानी एक हो गये 
हेतु मनुज के मर्दन !
भक्ति में रमे भक्तों पर भी 
विधि को दया न आयी !!
देखके तांडव प्रकृति का 
मौत भी है थर्रायी !

ऐसे में भी नरपिशाच हैं 
चाल न अपनी छोड़ें 
चले यदि वश, शवों पे भी 
दौड़ाएं सत्ता के घोड़े !
जाने किस माटी से विधना ने 
इनकी खाल बनायी !!
देखके तांडव प्रकृति का 
मौत भी है थर्रायी !

बहुत हुआ विध्वंस 
हे मालिक, अब तो रोक लगा ले 
अपने भीतर सोयी करुणा 
को झकझोर जगा ले 
माँ बच्चों की, बच्चे माँ की 
देते तुझे दुहाई !!
देखके तांडव प्रकृति का 
मौत भी है थर्रायी !

Wednesday, March 27, 2013

मुट्ठी भर जिंदगी




    रोज़ तलाश शुरू होती है
    मुट्ठी भर जिंदगी की.......
    ढूंढती उसे हर शय में
    बालकनी की धूप में
    बच्चों की मुस्कान में
    किसी अपने की बातों में
    कुकर की सीटी में
    किसी टीवी सीरियल में
    मार्केट में दुकान पर
    टंगे किसी आकर्षक परिधान में
    चटपटे गोलगप्पों में
    पर थोड़ी-थोड़ी जोड़ कर भी
    उतनी नही है हो पाती
    कि एक दिन का
    जीना निकल पाए !
    जितनी जोड़ पाती हूँ
    उसमे में भी रिस-रिस कर
    बहुत अल्प रह जाती है
    और मैं रह जाती हूँ
    रोज़ ही घाटे में !!



   

  

Saturday, March 2, 2013

धूप का दुपट्टा




धूप  हौले-हौले उतार रही है 
अपना पीला दुपट्टा 
और दिखने लगे हैं 
उसके श्यामल केश 
संध्या के रूप में !
हवा से हिलते पत्ते 
मानो आसमां की बालियाँ !
कुछ ही देर में 
श्यामल केश खुल जायेंगे पूरे 
और लेंगे रूप निशा का !
पूरी रात  अपने 
लम्बे काले केश फैलाये 
निशा देगी 
थपकियाँ धरती को .....
फिर सुबह इक दस्तक से 
सूरज की 
टूटेगी निद्रा धरती की !!

Friday, August 3, 2012

" धरा और मानव "



     
         
       " धरा और मानव "

        हे   धरा, तू ये बता 
       कब तक पियेगी तू हला ?
       तू नारी है, तू मात्री  है,
       तू धरणी है , तू वत्सला  !
 
        करता वही शोषण तेरा ,
        करता वही दोहन तेरा ,
        पोषित हुआ है जो युगों से 
        सीने पे तेरे हल चला !
        कब तक पियेगी तू हला ?

        कसमसाती, चोट खाती 
        अन्तः में ही कुलबुलाती 
        न कोई आया कि जिसने 
        घाव पर मरहम मला !
        कब तक पियेगी तू हला ?

        तू सहेजे प्रकृति का 
        सौंदर्य अपने वक्ष पर 
        ममत्व और करुणा सदा ही 
        रहे हैं तेरे अक्ष पर 
        जिसको तूने दी शरण है ,
        उसने ही तुझको छला  !
        कब तक पियेगी तू हला ?

        तू मूक है , तू मौन है 
        तेरे लिए सब गौण है 
        पीड़ाएँ तुझको जब मिलीं ,
        तब भी किया तूने भला !
        कब तक पियेगी तू हला ?

        तू भास्कर की प्रेयसी 
        तू शस्य- श्यामल  देह सी 
        स्वार्थ मद के अंधों ने 
        यौवन है  तेरा दिया जला !
        कब तक पियेगी तू हला ?

        तू जननी भी है, भगिनी भी 
        तू वेदना की हरणी भी 
        है गर्भ से तेरे हमें ही 
        अन्न का हर कण मिला !
        कब तक पियेगी तू हला ?

        माँ मुझे आशीष दे 
        उपकार तेरा तार दूँ 
        लौटा  सकूं तुझको छवि 
        पहले सी स्निग्धा, निर्मला !!
        न पीने दूंगी अब हला 
        क्योंकर पियेगी तू  भला ?
         हे   धरा , तू ये बता 
        कब तक पियेगी  तू हला !!!
       
       
       
        

Friday, July 6, 2012

बरसो रे मेघा !!!


 

   
  इतना भी मत तरसाओ 
      कि कमी तुम्हारी न खले
      बहुत देख ली राह तुम्हारी 
      आ जाओ चुपचाप चले !
              कहीं बरस के हद कर देते 
              कहीं की तुम लेते न खबर 
              कहीं ठिकाना बन जाता और 
               कहीं पकड़ते भी न डगर 
              बहुत हो गयी मनमानी अब 
              आओ के सूखा टले !
              बहुत देख ली राह  तुम्हारी 
              आ जाओ चुपचाप चले ........
    .                    इतने नखरे भला हैं  क्यूँकर 
                         हमको भी तो बतलाओ 
                        क्या कोई मांगें  हैं तुम्हारी 
                         ऐसा है, तो फरमाओ
                         इन्सां गर गर्मी न बढ़ाये 
                         दाल तुम्हारी भी न गले 
                        बहुत देख ली राह  तुम्हारी 
                       आ जाओ चुपचाप चले ........
    
  
   
              
              
             
            

Thursday, June 7, 2012

यथार्थ या परिकल्पना


       क्या है अधिक मधुर, बोलो 
      यथार्थ या परिकल्पना ?
      वह यथार्थ , जो पूर्ण हुआ 
      साक्षात् हुआ , भुक्त हुआ 
     ज्ञात हुआ,  अनुभूत हुआ ?
     या जन्म दे गया कल्पना को 
     अपूर्ण, अतृप्त , शेष रह कर !!
      दे गया है एक असीमित परिधि 
      अपने रंगों से रंगने को 
      अपनी उड़ान खुद भरने को 
      अपने  आकाश को  छूने को 
       राह में आए मोड़ों को 
      अपने अनुसार ही मोड़ने को 
      अपनी इच्छा तक जीने को,
      या इच्छा  का दम तोड़ने को ......!!
      है आकर्षण यह अज्ञात का 
      अथवा है असीम होने का 
       है संतोष न पाने का 
       या असंतोष कुछ खोने का .......?
       क्या है अधिक मधुर, बोलो 
       यथार्थ या परिकल्पना ?