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Wednesday, March 27, 2013

मीरा

राधा बनने के स्वप्न दिखाए
मीरा भी न रहने  दिया
मेरे प्रेम-प्रगाढ़ का तुमने
प्रियतम कैसा फल ये दिया !
तुम तो कृष्ण थे, कृष्ण रहे
लीलाओं में मग्न रहे
किन्तु उन घावों का क्या
जो तुम्हें पाने को मैने सहे ?
पूरा जीवन कर डाला
भस्म प्रेम की ज्वाला में
निः संकोच हो किया पान
छब देख तुम्हारी हाला में
तुम कठोर तब भी न पिघले
निष्ठुर थे, निष्ठुर ही रहे !
किन्तु उन घावों का क्या
जो तुम्हें पाने को मैने सहे ?
देते थे उपदेश जगत को
न करना फल की अभिलाषा
मैं मूढमति तब समझ न पाई
गूढ़ तुम्हारी यह भाषा
प्रेम-तपस्या विफल हुई
जल-प्रपात नयनों से बहे !
बोलो उन घावों का क्या
जो तुम्हें पाने को मैने सहे ?
यह जन्म गँवा चुकी तो क्या
सौ जन्म पुनः फिर ले लूँगी
प्रेम-मुरलिया अधर लगाकर
वृन्दावन में खेलूंगी !
तभी भरेंगे घाव सभी
जो तुम्हें पाने को मैने सहे
और कह पाऊँगी गर्व से फिर
तुम मेरे थे, मेरे ही रहे !!

17/9/12




Wednesday, March 13, 2013

स्पंदन

एक स्पंदन 
जो तुम्हारी निगाह से, 
तुम्हारे तसव्वुर से 
होता है मुझ में ,
झंकृत कर जाता है 
भीतर तक गहरे कहीं
मेरी शिराओं को
धमनियों को
रोमरोम को .........



Saturday, July 28, 2012

मैं खंड-खंड हूँ !


         
     


     
     
        प्रिय तुम कहते हो  

        और सह न पाओगे 

        बिखर जाओगे 

        खंडित हो जाओगे !

        किन्तु मेरा अधिक न बिगड़ेगा 

        क्योंकि मैं तो हूँ ही खंडित 

        हाँ ! सत्य सुना तुमने !

        मैं खंड-खंड हूँ !

        तुमने है चाहा खंडों को 

        जो रह चुके हैं कभी चूर्ण 

        और अब तक न 

        हो सके पूर्ण !

        अतः मैं भयभीत

        हो जाती हूँ 

        यह सोचकर कि 

        तुम्हारी वही परिणिति न हो 

        तुम चूर्ण न बनो कभी 

        तुम पूर्ण ही रहो सदा 

        तुम पूर्ण ही रहो सदा !!!

Thursday, July 5, 2012

प्रतीक्षा

 

 
सजन तुम बिन कैसा सृजन ?
देव बिन कैसा भजन ?
पायल की झनकार हो क्यूँकर
क्यूँ हो चूड़ियों की खन-खन ??
किस लिए काजल लगाऊं
किसलिए बिंदिया सजाऊं
किस लिए श्रृंगार करूं मैं
किसे रिझाने का करूं जतन ??
हैं शब्द टूटे, क्या करूं
हैं गीत रूठे, क्या करूं
क्योंकर मनाऊं उनको मैं
न दिखता है कोई प्रयोजन !!!
न भाती है सरगम कोई
न सुहाता मौसम कोई
न ही दिखती आसकिरण
मन घूम आता दूर गगन ...............
उन अधूरे स्वप्नों का
एहसास छलता है मन को
पूर्ण करने के लिए
किया था जिनका चयन !!!
बोलो क्या कहूँ इनसे
कितनी अवधि तक रुकें
ये चूड़ी, बिंदिया, गीत, मौसम
तुमको बुलाते हैं सजन !
कब दोगे इन्हें दर्शन ??
कब दोगे मुझे दर्शन ??

Friday, June 8, 2012

इस विनिमय में क्या रखा है ?

       

      तुम करो मुझसे प्रेम-निवेदन 
      मैं स्वीकार न कर पाऊं 
      तुम दो उलझन मुझको 
      मैं हताशा दे जाऊं 
      इस विनिमय  में क्या रखा है ?
      सब जानकर अनजान बनो 
      देखकर अनदेखा करो 
      भेजो  नित प्रेम संदेशे 
      मैं शून्य ही लौटा पाऊं
      इस विनिमय  में क्या रखा है ?
      झूठी आशाएं तुम बांधो 
      स्वयं ही खुद को प्रलोभन दो 
      फिर दोष मुझे तुम इसका दो 
      बिन मेरे कुछ भी दिए 
      मेरी ओर से खुद को दो 
      इस विनिमय में क्या रखा है ?
      देते रहो निस दिन उलाहने 
       ध्यान मेरा तुम पाने को 
      मैं न ध्यान ज़रा भी दूँ 
       तुम्हें यही समझाने को 
       मत करो वक्त ज़ाया अपना 
       इस विनिमय में क्या रखा है ?
       इस पर अब विराम लगाओ 
      या तो सुलह का हाथ बढ़ाओ
      या फिर अपने रस्ते जाओ 
      इस विनिमय में क्या रखा है ???