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Saturday, August 3, 2013

ईमानदारी

शुक्र है ईमानदारी को

उतनी फफूंदी नहीं लगी


जितनी थी अपेक्षित


इस भ्रष्टाचार की


उमस में !


तो हम यह मान लें


कि सिद्धांतों व आदर्शों के


वातानुकूलित यंत्र


कारगर हैं अब भी ...


शायद रहें हमेशा !


सभी हाथ व्यस्त नहीं हैं


बेईमानी के पाँव पखारने में,


उन्हें जूतियाँ पहनाने में !


कुछ मशगूल हैं


उनकी राहों में


काँटे बोने में .....


उन हाथों को हमें


संरक्षित करना होगा


तभी 'हम ' 


संरक्षित रह पायेंगे ......


सम्बन्धों के हाशिये

अपेक्षित है सम्बन्धों का 
जीवन के केंद्र में होना 
पर प्राय: 
चले जाते हैं 
हाशिये पर वे 
सरक -सरक कर 
स्वार्थों, व्यस्तताओं और 
महत्वाकांक्षाओं की 
गाढ़ी तरलताओं की 
साज़िश का शिकार होकर ,
उनमे बह -बहकर !
और वहीं से चीख -चीखकर 
दुहाई माँगते हैं 
अपने प्राणों की !
सुन लिए जाने वाले 
बचा लिए जाते हैं 
कभी -कभार ,
हाशिये से खींच लाये जाते हैं 
परिधि के भीतर 
और अनसुने 
वहीं 
हाशिये का तट पकड़े 
मदद की गुहार लगाते 
अन्ततः 
छोड़ देते हैं हाथ 
तोड़ देते हैं दम !!

Wednesday, March 27, 2013

'बलात्कार'




  'बलात्कार' 

  आओ दरिन्दों
  मुझे लूटो, खसोटो, नोचो !
  गौर से देखो
  एक नारी हूँ मैं
  ब्रहा द्वारा तैयार
  तुम्हारे ऐशो आराम का सामान,
  तुम्हारी ऐय्याशी का सामान,
  तुम्हारी पाश्विक, घिनौनी औऱ नरपैशाचिक
  जरूरतों को पूरा करने का सामान !
  चिथडे चिथडे कर दो
  वो झूठी अस्मिता
  जो बचपन से मैं
  साथ लेकर जी रही थी !
  दिल दहला देने वाली मर्दानगी दिखा दो
  सारी दुनिया को !
  अरे, मर्द हो !
  कोई मजाक है क्या ?
  ऐसी दुर्गति करदो
  मेरी आत्मा और शरीर की,
  कि पूरी औरत जमात
  सात पीढियों तक काँपे,
  औरत होने के लिये !!
  डरो मत !!
  अधिक कुछ नहीं होगा !
  तुम्हारी तलाश, और कुछ
  सजा के बाद सब ठीक हो जायेगा तुम्हारा,
  धीरे -धीरे !
  मैं शायद न बचूँ
  अपने जऩ्मदाताओं की
  जीवन पर्यन्त यातना देखने,
  और मुझ पर चल रही
  टी वी चैनलों की प्राईम टाईम बहस देखने ....
  और वे तमाम धरने और प्रदर्शन देखने,
  जो इस तुम्हारे क्षणिक सुख से उपजे !!
  पर वो सब बाद की बातें हैं !
  शायद इतनी आबादी में
  सब भूल भी जायें !
  पर तुम तो अपना कर्म करो,
  जिसके लिये तुम्हे
  देवतुल्य पुरुष जीवन मिला है!!
  मर्द बनो !! निडर होकर !!!

  dec.2012

आक्रोश

इक नपुंसक हुक्मरानों की है 
टोली डर रही !
एकतरफा क़ायदे, इंसानियत है मर रही !!
मख़मली दीवारों के हैं
कान बहरे हो चुके
कौन सी फिर गुफ़्तगू
ये ज़िंदा लाशें कर रहीं ??
ज़ुल्मो सितम की सब हदें
हैं बेकसूरों के लिए
वहशियाना भेडियों की
नस्ल तांडव कर रही !!
चीत्कारें सुन न पाते,
दुर्ग में बैठे हैं जो,
रातदिन दौलत खनकती
कान में बस भर रही !!
तुम लुटेरे हिंद की अस्मत् के हो,
क्या समझोगे ?
मासूम सी इक जान पर
लुटने से क्या गुज़र रही !!
आज जब आवाम के हो
कठघरे में ज़ालिमों,
क्यूँ ज़ुबाँ कटी तुम्हारी,
वादों से मुकर रही ??
होश में आ तानाशाही
वक़्त अब वो आ गया,
अर्थी तेरी उठने में
कोई घडी गुज़र रही !!! 


23/12/12  

 

Monday, March 11, 2013

अग्नि परीक्षा

इतने युग, इतने वर्षों से 
पावक तपीं इतनी सीतायें 
देने को विविध परीक्षाएँ ,
अपने चरित्र की, दृढ़ता की 
कि गंध भी उनकी देह की अब 
अग्नियों को है लगती परिचित 
सो प्रेम से वह अपना लेती !
जिस दिवस परीक्षा लेगा काल 
शौर्यंवान औ धैर्यवान 
औ निष्कलंक किसी राम की,
अग्नि भी न पहचानेगी 
उस नव विचित्र आगन्तुक को,
न करेगी उसका आलिंगन ,
न होगा उसका दहन  !
तब भूल यह तुम न करना ,
उसे मानने की पावन ,
क्यूँकि अग्नि तो है निर्मल 
अपनाएगी केवल निश्छल 
पर तिरस्कार वह कर देगी ,
जिसमें पायेगी तनिक भी छल ,
जिसमें न होगा सत्य का बल !
और हो जायेगा वह असफल !!


Sunday, January 6, 2013

तू है कहाँ ?

हे प्रभु, तू है कहाँ ?
क्या कहीं तू सो गया ?
सुन ले,जब तेरे जगत में 
पीड़ितों को न्याय होगा ,
अब तभी मंदिर में तेरे नाम का दीया जलेगा !!

आत्मा के चीथड़े
कर देने वाले वहशियों को,
उन दरिंदों को कुकर्मों का
यथोचित फल मिलेगा ,
अब तभी मंदिर में तेरे नाम का दीया जलेगा !!

अन्नदाता देश का जो,
सींचता भू रक्त से,
भूख से व्याकुल विवश हो
प्राण तजना छोड़ देगा ,
अब तभी मंदिर में तेरे नाम का दीया जलेगा !!

भ्रष्टाचारी,देशद्रोही
शक्तियों के वृक्ष का
नन्द वंश के सरीखा
ही समूल नाश होगा ,
अब तभी मंदिर में तेरे नाम का दीया जलेगा !!


अपनी शक्ति भूल, जो
नारी अहिल्या है बनी ,
उसमें जब दुर्गा की शक्ति
का नया संचार होगा ,
अब तभी मंदिर में तेरे नाम का दीया जलेगा !!

पाप और अधर्म की
गहरी जड़ें मिटाने को,
हर दिशा में गगनभेदी
शंख का जब नाद होगा,
अब तभी मंदिर में तेरे नाम का दीया जलेगा !!


01/01/2013



बलात्कार

आओ दरिन्दों
मुझे लूटो, खसोटो, नोचो !
गौर से देखो
एक नारी हूँ मैं
ब्रहा द्वारा तैयार
तुम्हारे ऐशो आराम का सामान,
तुम्हारी ऐय्याशी का सामान,
तुम्हारी पाश्विक, घिनौनी औऱ नरपैशाचिक
जरूरतों को पूरा करने का सामान !
चिथडे चिथडे कर दो
वो झूठी अस्मिता
जो बचपन से मैं
साथ लेकर जी रही थी !
दिल दहला देने वाली मर्दानगी दिखा दो
सारी दुनिया को !
अरे, मर्द हो !
कोई मजाक है क्या ?
ऐसी दुर्गति करदो
मेरी आत्मा और शरीर की,
कि पूरी औरत जमात
सात पीढियों तक काँपे,
औरत होने के लिये !!
डरो मत !!
अधिक कुछ नहीं होगा !
तुम्हारी तलाश, और कुछ
सजा के बाद सब ठीक हो जायेगा तुम्हारा,
धीरे -धीरे !
मैं शायद न बचूँ
अपने जऩ्मदाताओं की
जीवन पर्यन्त यातना देखने,
और मुझ पर चल रही
टी वी चैनलों की प्राईम टाईम बहस देखने ....
और वे तमाम धरने और प्रदर्शन देखने,
जो इस तुम्हारे क्षणिक सुख से उपजे !!
पर वो सब बाद की बातें हैं !
शायद इतनी आबादी में
सब भूल भी जायें !
पर तुम तो अपना कर्म करो,
जिसके लिये तुम्हे
देवतुल्य पुरुष जीवन मिला है!!
मर्द बनो !! निडर होकर !!!   

19/12/12

Friday, September 21, 2012

' किसकी आज़ादी ??'


       

      आज़ादी का दिन है आया
      फिर झंडा फहराएंगे
      विद्यालयों में ड्रम की ताल पर
      जन-गण-मन-गण गाएंगे !
      पर किसकी आज़ादी है ये
      यही समझ न पाएंगे
      बूढ़े एक रिवाज़ की भांति
      इसे  मनाते  जायेंगे !!
      आज़ादी की परिभाषा
      उस ललना से पूछो तो
      जिसके रक्तपान पर तुम
      अंकुरण से अब तक जीवित हो !
      अंतर केवल यही रहा
      शैशव में रक्त था स्नेह भरा
      पर वही शिशु जब पुरुष बना
      स्वार्थ में, मद में चूर हुआ !
      भूल गया वह नारी थी,
      जिसने उसका पोषण किया
      उसीका पत्नी, पुत्री रूप में
      यथाशक्ति शोषण किया !!
      तन पर, मन पर , जीवन पर
      चुन-चुन कर उसने वार किये
      वह मूक, मौन सहती रही
      जीवन-क्षण उस पर वार दिए !!
      कभी बिकी बाज़ारों में
      कभी चिनी दीवारों में
      मोहरा बनी रही , जब आई
      सत्ता के गलियारों में !!
      उस पर ही कानून बनाये
      धर्म  के ठेकेदारों ने
      ज़ुल्मों के कहर भी ढाए, तो देखो
      उसीके पहरेदारों ने !!
      क्या अब भी ये कहते हो,
      आज़ादी का दिन आया ?
       नहीं , तब  तक नहीं
       जब तक है उस पर काला साया !!
       कुछ बदला है, कुछ बदलेंगे
       हालातों का सरमाया
       तभी कहेंगे सच्चे दिल से
      "आज़ादी का दिन आया !!"
        14/8/12
    
    
   
    
    

Wednesday, August 8, 2012

'अतीत के पंछी'



    अतीत के पंछी
    उड़-उड़कर आते हैं 
    यादों की बालकनी में !
    पर जब भी बढाऊँ हाथ 
    उन्हें छूने, पकड़ने को 
    फुर्र से उड़ जाते हैं 
    उसी अतीत के नभ में !
    अहसास मुझे दिलाते 
    कि वे कितने उन्मुक्त हैं 
    मेरी पकड़ से !
    पर मैं ?
    मैं तो उन्मुक्त न हो पाई 
    अतीत की बेड़ियों से 
    जो अब भी हैं डाले 
    बंधन मेरे पाँव में 
    कुछ कदम चलते ही 
    खिंच जाती हूँ पीछे 
            या 
    आगे बढने की चाह में 
    गिर जाती हूँ 
          पर 
    पंछी नहीं बन पाती हूँ !!!

    
   
    
    
  

Friday, July 27, 2012

बुढ़ापे का फल


           
           आओ सखी मंगल गान गाएँ
           आओ री तोरण-द्वार सजायें
           बूढ़े वृक्ष पे फल आया है 
           उस पर हम बलिहारी जाएँ !

           क्या है अवस्था, क्या है आयु 
           यह सब बातें बेमानी हैं 
           उजड़ा चमन भी लहराता है 
           यह बात अब समझ ही जाएँ !
     
            खुला है बंद पिटारा कबसे 
            हुआ है उसका भाग्योदय 
            मिलें डाल से बिछड़े सुमन सब 
            इसी दुआ में हाथ उठायें !
      
            देर हुई , पर मिला न्याय तो 
            उसकी लीला अपरम्पार 
            सब खोये अधिकार मिलेंगे 
            और मिलेगा पिता का प्यार !
        
              जाने और कितने ही ऐसे
              लावारिस हैं फूल बाग़  में 
              उनको भी माली  मिल जाये 
               तो वे भी शुकर मनाएं !

             आओ सखी मंगल गान गाएँ
              आओ री तोरण-द्वार सजायें
             बूढ़े वृक्ष पे फल आया है 
             उस पर हम बलिहारी जाएँ !
         

" टूटा फूल "


             

          आज सुबह जब निकली घर से 
          बागीचे से रही गुज़र
          एक नन्हीं आवाज़ से चौंकी 
          था बच्चे के रोने का स्वर !
          इधर-उधर जब ढूँढा मैने 
          प्यारे से एक फूल को पाया 
          लेकिन महका, खिला नहीं था 
          वह  था टूटा, कुम्हलाया !
          प्यार से मैने उसे उठाया ,
         "क्यों रोते हो नन्हें सुमन ?
         बोलो तुम्हे है किसका डर ?"
         सहम, सिमट कर बोला मुझसे 
         "मुझे लगा दो डाली पर !
          मैं भी उन फूलों की तरह 
          डाली पर खिलना चाहता हूँ ,
          पंखुड़ी एक टूटी, तो क्या 
          सबसे मिलना चाहता हूँ !
         कोई झोंका  हवा का आया 
         और पंखुड़ी तोड़ गया 
         पर मैं तो अब भी फूल ही हूँ 
         इसमें मेरा दोष है क्या ?"
         उसकी बातों का मर्म मुझे 
         अंदर तक झकझोर गया 
        अनचाहे ही ध्यान मेरा 
         ऐसे बच्चों की ओर गया, 
        जिन्हें समय ने वंचित रखा ,
         पंखुड़ी रुपी अंगों से 
         और साथ ही वंचित रखा 
        सपनों के सतरंगों  से !
        क्यों नहीं भला ये जुड़ सकते हैं 
        फूल ये अपनी डाली से ?
        क्यों बिछड़ना है जरूरी 
        इनको अपने माली से ?
        हम उनके माली बन जाएँ 
        और ये संकल्प लें 
        सब बच्चों के संग ही 
       इनको भी हम शिक्षा दें !
       कोई कमी न आड़े आए
       कभी भी इनकी प्रगति में 
       वक्त पड़े तो एक-दूजे के 
       आँख और कान ये बनें !
       इनमे भी वो जोश है 
       कुछ कर-गुज़र ये जायेंगे 
       ये हैं तारे इस ज़मीन के 
       रौशनी फैलायेंगे !!!

         

Friday, June 1, 2012

न आज़माओ

       
        " न आजमाओ "
       और अवाम को न आज़माओ 
       सत्ताधारियों बाज़ आ जाओ 
       चुक गयी है सहनशक्ति अब 
       कहीं पे तो विराम लगाओ !!
             जीने लायक नहीं कुछ छोड़ा 
             न ही ज्यादा, न ही थोड़ा
             खुद महलों के भोग करो तुम 
             हमसे छप्पर भी ले जाओ 
             कहीं पे तो विराम लगाओ !!
    पानी, बिजली, ईंधन सब पर 
    इतना 'कर' कर दिया है क्यूँकर 
    हवा-प्रकाश जो देती कुदरत 
    उनको भी क्यूँ मुफ्त दिलाओ 
    कहीं पे तो विराम लगाओ !!
             कितना बड़ा है उदर तुम्हारा ?
             कितने में बोलो होगा गुज़ारा ?
             जिस जनता ने चुना है तुमको 
             उसी को लूट-खसोट के खाओ !
             कहीं पे तो विराम लगाओ !!
    अभी तो जागा है एक अन्ना 
    बोलो क्या है तुम्हारी तमन्ना ?
    सौ करोड़ अन्ना बन जाएँ 
    उस सैलाब में तुम बह जाओ ?
    कहीं पे तो विराम लगाओ !!
              इक दिन घड़ा सभी का भरता 
              'वो' सबका इन्साफ है करता 
               ऐसा न हो अगले दशहरे
               तुम रावण का पात्र निभाओ 
               कहीं पे तो विराम लगाओ !!
               सत्ताधारियों बाज़ आ जाओ  !!!