Saturday, July 28, 2012

मैं खंड-खंड हूँ !


         
     


     
     
        प्रिय तुम कहते हो  

        और सह न पाओगे 

        बिखर जाओगे 

        खंडित हो जाओगे !

        किन्तु मेरा अधिक न बिगड़ेगा 

        क्योंकि मैं तो हूँ ही खंडित 

        हाँ ! सत्य सुना तुमने !

        मैं खंड-खंड हूँ !

        तुमने है चाहा खंडों को 

        जो रह चुके हैं कभी चूर्ण 

        और अब तक न 

        हो सके पूर्ण !

        अतः मैं भयभीत

        हो जाती हूँ 

        यह सोचकर कि 

        तुम्हारी वही परिणिति न हो 

        तुम चूर्ण न बनो कभी 

        तुम पूर्ण ही रहो सदा 

        तुम पूर्ण ही रहो सदा !!!

6 comments:

  1. bahut khoobsoorat likha hai rachna ji

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  2. बहुत सुंदर और गहरी बात रचना जी .......... .

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    1. अत्यन्त आभार सानंद जी !!

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  3. बहुत सुन्दर रचना रची है , बॉय गोड की कसम खंड खंड बिचला दिया इस रचना ने

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