था वो नन्हा फूल लड़ा
बड़ी हिम्मत और सब्र से , पर
झेल न पाया इंसानों के
ज़ुल्म ओ सितम की आंधी को
और दरिंदगी जीत गयी !!
कुचला गया था इस हद तक
रोने के भी लायक न था
जख्म थे इतने गहरे कि
कोई सीने के लायक न था
बिछड़ा था माली से अपने
और चमन से बहुत दूर
लाख दुआएं काम न आयीं
और दरिंदगी जीत गयी !!
एक कोंपल थी, कली अभी तक
बनने न पाई थी वो
लाखों सपने इस दुनिया में
पलकों पे लायी थी वो
पूरे वतन की आशाओं के फलक पे
लहराई थी वो
रक्षक से भक्षक विजयी हुआ
और दरिंदगी जीत गयी !!

जाते-जाते कितनी रूहें
जाने घायल कर गयी
कितनी नन्ही जानों को
सादी मौत का कायल कर गयी
तैनात फ़रिश्ते सुबहो शाम
उसकी खिदमत में रहते थे
फिर भी झपट्टा मारा काल ने
और दरिंदगी जीत गयी !!
है हिसाब देने को कोई
कितने ऐसे फलक गिरेंगे ?
कब तक इन्सां बाज़ारों में
यूँ सौदे की तरह बिकेंगे ?
कब तक ये व्यापार चलेगा
कितना कारोबार फलेगा
कब तक ये सुनना पड़ेगा
कि दरिंदगी जीत गयी ???
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ReplyDeleteAankhein meri nam hui
ReplyDeletekitni peeda sehati ho Tum
Kitna angaar dba sine mey
kitna kam kehti ho Tum
Tum jso se zinda smvedna
Jo dukh sbka sehti ho Tum
thnx fr ur response PS !
Deleteदुखद !
ReplyDeleteजी ! और इतना दुखद कि जिसने मानवता को झकझोर कर रख दिया है !!
Deleteमार्मिक प्रस्तुति .... दुखद घटना पर सटीक प्रश्न करती रचना
ReplyDeleteजी, जवाब न जाने कब मिलेगा !!
Deleteआपके इस पोस्ट की चर्चा यहाँ भी...
ReplyDeletehttp://tetalaa.nukkadh.com/2012/03/blog-post_16.html
बहुत आभार संतोष जी, मेरी पीड़ा को अधिक लोगों तक पहुँचाने के लिए !!!
ReplyDeleteक्या कहूँ...
ReplyDeleteनिःशब्द हूँ.....
नमन आपकी लेखनी को...
बहुत बहुत धन्यवाद्, expression ji !!............... काश के हम लोग अपनी कलम द्वारा ऐसी मार्मिक दुर्घटनाओं को कुछ हद्द तक रोक पाने में समर्थ हो पायें !
ReplyDeleteSir,
ReplyDeletekbile Taareef hai apki baat// magar ham sab kitne lachar hain ki jin longon ke liye ye saari baten, aur soch hai ve log kabhi nahi janenge aap ke hamare dil ka dard , nahin janen ge is sundar sooch ki keemat //
THANKS ALOT
MAVARK