Monday, March 11, 2013

अग्नि परीक्षा

इतने युग, इतने वर्षों से 
पावक तपीं इतनी सीतायें 
देने को विविध परीक्षाएँ ,
अपने चरित्र की, दृढ़ता की 
कि गंध भी उनकी देह की अब 
अग्नियों को है लगती परिचित 
सो प्रेम से वह अपना लेती !
जिस दिवस परीक्षा लेगा काल 
शौर्यंवान औ धैर्यवान 
औ निष्कलंक किसी राम की,
अग्नि भी न पहचानेगी 
उस नव विचित्र आगन्तुक को,
न करेगी उसका आलिंगन ,
न होगा उसका दहन  !
तब भूल यह तुम न करना ,
उसे मानने की पावन ,
क्यूँकि अग्नि तो है निर्मल 
अपनाएगी केवल निश्छल 
पर तिरस्कार वह कर देगी ,
जिसमें पायेगी तनिक भी छल ,
जिसमें न होगा सत्य का बल !
और हो जायेगा वह असफल !!


6 comments:

  1. तभी तो बोलते हैं अग्नि परीक्षा ...
    बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति
    साभार !

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    Replies
    1. धन्यवाद शिवनाथ कुमार जी :))

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