एक स्पंदन
जो तुम्हारी निगाह से,
तुम्हारे तसव्वुर से
होता है मुझ में ,
झंकृत कर जाता है
भीतर तक गहरे कहीं
मेरी शिराओं को
धमनियों को
रोमरोम को .........

जो तुम्हारी निगाह से,
तुम्हारे तसव्वुर से
होता है मुझ में ,
झंकृत कर जाता है
भीतर तक गहरे कहीं
मेरी शिराओं को
धमनियों को
रोमरोम को .........

भाव भरी सुन्दर रचना
ReplyDeleteधन्यवाद शिवनाथ कुमार जी :))
Deleteक्या बात...बहुत ही सुन्दर
ReplyDeleteशुक्रिया रश्मि जी :))
ReplyDeleteमोहब्बत में निगाहों की छुवन भी सिरहन पैदा करती है न???
ReplyDeleteसुन्दर!!!
अनु
शुक्रिया अनु जी ! निगाहों की छुवन सबसे अधिक असरदार होती है :)
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